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महिला हैडकांस्टेबल से लेकर डिप्टी तक ने धमकाया- चुप रहाे, नहीं ताे वापस पाक भेज देंगे

मैं लक्ष्मी, जाति भील। पिता बुद्धाराम। रहने वाले भारत के ही लेकिन कर्मों के कारण पाकिस्तान पहुंच गए। वहां से अपनी जिंदगियां बचाने के लिए 2015 में जोधपुर आ गए। आंगणवा की बस्ती में आशियाना बसाया। भाइयों के ससुराल पक्ष और अपने भी इसी बस्ती में रहते थे, तो उम्मीद थी कि अपनों के बीच जिंदगी अब आसानी से जी सकेंगे। हम भारत, यहां के कानून, सिस्टम और गली तक को नहीं जानते थे। जिंदगियां संकट में थी, बचाने के लिए भागे, अपने देश में अपनों के बीच सुखी रहने के लिए आ गए।

मेरी जिंदगी की कहानी संगीन है। इसे मैंने अपनी डायरी में लिखा। अब इतना समय नहीं है कि पूरी डायरी पढ़ कर बता सकूं। इस शॉर्ट वीडियो में अपनी जिंदगी की कहानी बताना चाहती हूं। सीधे-साधे व नेक इंसान की बेटी हूं। पाकिस्तान में सभी लोग गलत नहीं हैं, लेकिन वहां भी कुछ ऐसी कंपनियां हैं, ऐसे लोग रहते हैं, जो इंसान के दुश्मन हैं। वो चैन से नहीं जीने देते। गरीब के बच्चे पढ़ नहीं सके, आगे नहीं बढ़ सके, गुलाम बनाकर रखना चाहते हैं। ये खतरनाक कंपनियां अच्छे लोगों के पीछे पड़ जाती हैं।

जब छोटी थी, तभी से ये कंपनियां मेरे पीछे लग गई थी। अपना धर्म बचाने के लिए मैं जागरूक थी। पढ़ लिखकर अपने देश में रहने का सपना देखा तो कंपनी ने इस सपने को तोड़ने की ठान ली। बहुत दु:ख दिए। वहां के जागीरदार व एक पार्टी ने हमारा साथ दिया। हम मौत के मुंह से बचकर आ गए। दो साल पहले मेरी एक छोटी बहन ने यातनाओं के कारण 2017 में यहां दम तोड़ दिया।

पहले ही दबे और कुचले हुए थे, जैसे-तैसे जोधपुर पहुंचे थे और पहले ही दिन से भाई के ससुराल पक्ष ने हमले और अत्याचार शुरू कर दिए। पाकिस्तान की तरह यातनाएं देने की कोशिश। रिपोर्ट में जिन लोगों के नाम लिखवाए हैं, उन्होंने भगत की कोठी से ही हम बहनों को गायब करवाने की कोशिश की। शादी व रिश्तों के बहाने अपनापन दिखाकर इन लोगाें ने हम बहनों को बेचने की कोशिश की।

इनके तौर तरीके से समझ में आ गया कि यहां अपने भी धोखा देने में लगे हैं। जब जोधपुर आ गए थे तो पाकिस्तान में भाई को गिरफ्तार करवा दिया था। एक वकील साहब ने पािकस्तान छोड़ते समय आगाह किया था कि गैंग वहां भी परेशान करेगी, ध्यान रखना। हमने उनकी बात पर गौर नहीं किया, लेकिन भाई के ससुराल पक्ष की हरकतों ने वो सलाह याद दिला दी। इनका मकसद हमें बेचना ही था, बर्बाद करना था।

प्रताड़ना की जानकारी हमने हमारे गारंटर सुनील को बताई तो उन्होंने भी चुप रहने की हिदायत दी। अपहरण के प्रयास हुए, दूसरे लोग भी इस गैंग का ही साथ दे रहे थे। मंडोर पुलिस से मदद मांगी तो पुलिस ने भी हमें ही डांटा। कहते, यहां लड़ने आए हो। यहां से भागकर ट्यूबवेल पर रहने लगे। वहां भी उनके लोग पहुंच गए।

हद पार परेशान करने लगे। पुलिस को शिकायत दी, आईजी को बताया। सहायता मांगी। सुरक्षा मांगी। इस पर कोई सहायता नहीं मिली। महिला थाने में हमारे खिलाफ मुकदमा करवा दिया गया। पुलिस को पूरी बात बताई, सबूत दिए, लेकिन नहीं सुना और मुझे पाबंद कर दिया। इसके बाद भाभी से रिश्ता तोड़ दिया। फिर भी इन लोगों ने पीछा नहीं छोड़ा। मंडोर थाने में मैंने रिपोर्ट दी, उस पर भी कार्रवाई नहीं की। इसमें भी मुझे ही पाबंद कर दिया।

पाबंद नहीं हुई तो पुलिस परेशान करने लगी। डिप्टी साहब तक ने धमकाया, चुप रहो नहीं तो वापस पाकिस्तान भेज देंगे। धमकियां सहन करती रही। बाद में एसपी, कलेक्टर को आपबीती बताई। मुख्यमंत्री, गृहमंत्री तक ज्ञापन भेजे।

फरवरी 2020 में प्रधानमंत्री कार्यालय तक जाकर अपनी शिकायत दी। मेरी संपर्क पोर्टल व पुलिस में दी शिकायत पर मुझे 29 जुलाई को मंडोर थाने बुलाया गया। पुलिस वालों ने बड़ी शराफत से बात की, शिकायत पूछी। वहां लेडी कांस्टेबल दुर्गा को मैंने अपनी पूरी बात, सारे सबूत, डायरी, फोन, सबकुछ दिखाया। मुझसे सभी सबूत लेने की जगह छीनने की कोशिश की। बच्चा जहन मेरे साथ।

उसके हाथ में ये देकर उसे भगा दिया। मुझे पकड़ लिया। दुर्गा मैडम ने आरोप लगाना शुरू कर दिया कि मैंने उससे मारपीट की है। अंदर बंद कर दिया। मेरी बहनों ने लोगों को फोन कर जानकारी दी कि मुझे पुलिस ने पकड़ लिया है। मुझे डरा-धमका कर पहले की गई शिकायतों पर चुप रहने को कहा।

थाने के सवाई ने भी बुरा-भला कहा। जबरन साइन करवाए। हिंदी में लिखा, जो मुझे आती नहीं। अंग्रेजी व उर्दू में भी साइन करवाए। मेरे साथ छल हुआ। सभी ने मिलकर धोखा किया। मेरी बहन ने एक डॉक्टर से फोन करवाया। थाने में इंजेक्शन तक लगाया और हंसकर बोली, अब इसका इलाज हो गया है। इसे छोड़ दो। इसके बाद रात आठ बजे कलेक्ट्रेट में सर प्रताप की मूर्ति के पास छोड़ दिया।

दयाल, जिसे लक्ष्मी डॉक्टर बनाने का सपना पूरा करना चाहती थी।


देचू पुलिस ने भी बुलाकर एक बार प्रताड़ित किया था। शरीफा ने गैंग के माध्यम से ही मेरे भाई पर दबाव बनाकर शादी की थी। हमें भी दूसरे लोगों के यहां शादी करवा कर बर्बाद करना चाहते थे। भगवा लिबास में दो आदमी भेजे गए थे। हमें टोना-टोटका के नाम पर डराने आए थे। पाकिस्तान से ही आए डॉ. भागचंद मेरी मदद के नाम पर सहानुभूति जता रहे थे, लेकिन वे भी उसी गैंग में जुड़ गए थे।

नाथड़ाऊ की टीकू बाई को हमें शादी के झांसे में लाने का काम सौंपा गया था। वह हमारे घर भी आई थी। रिश्ता देने को भी हम तैयार हो गए थे, लेकिन जब टीकू के भाई की सास के इशारे पर काम करने का पता चला तो हमें समझ आ गया।

गंगाराम नामक व्यक्ति ने भी हमसे छल करने की कोशिश की। हर किसी ने मुझसे पैसे लिए, शिकायत लिखने, थाने में दर्ज करवाने, आगे पहुंचाने के नाम पर ठगते गए। गांव में लोगों ने पहले सहारा दिया, बाद में वे भी दु:ख देने लगे। अब मुझे ये हैरत हो रही है कि पाकिस्तान के कुछ लोगों के कारण मैं बचकर यहां तक पहुंची लेकिन यहां कुछ लोगाें ने वहां की गैंग के साथ मिलकर हमारे खिलाफ युद्ध शुरू कर दिया।

दोनों भाई, जुड़वां हैं, भोले हैं। मैं बड़ी थी। लड़ी। 10 साल की थी तब से लड़ती आ रही हूं। इतने लोगों ने तीनों बहनों को सताया। गैरों से ज्यादा अपने हमें बर्बाद करने में लग गए। मेरी यह डायरी सही हाथों में पहुंची तो बहुत से परिवारों की जिंदगी बच जाएगी। अब ईश्वर ही हमारी अंतिम जगह है। वहीं की यात्रा करनी है। सभी जहां जाते हैं, मजबूरन हमें भी वहीं जाना पड़ा है।

उर्दू-अंग्रेजी लिखने की आदत थी, टूटी-फूटी हिंदी में लिखा था सुसाइड नोट

लक्ष्मी की डायरी

मौके से मिले नींद की गोलियों के खाली रैपर, इंजेक्शन, सीरिंज व कीटनाशक के डिब्बे


देचू के लाेड़ता अचलावतां गांव में एक ही परिवार के 11 सदस्याें की माैत के मामले में पुलिस ने दुबारा मौके पर जांच की। इसमें पुलिस टीमों ने मृतकाें के सदस्यों के पासपोर्ट ढूंढे। इन्हीं से पता चला कि भील परिवार धार्मिक वीजा पर भारत आया था।

पुलिस सूत्रों के अनुसार भील परिवार की बेटी प्रिया उर्फ प्यारी और लक्ष्मी, दोनों ने नर्सिंग कर रखी थी, लेकिन प्रिया ही प्राइवेट हॉस्पिटल में नौकरी कर रही थी। बताया जा रहा है कि वर्ष 2018 में पारिवारिक विवाद में इस परिवार की झोंपड़ी को आग लगा दी गई थी और लक्ष्मी की नर्सिंग डिग्री इसमें जल गई थी।

ग्रामीण पुलिस की टीमें यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही है कि प्रिया या लक्ष्मी, दोनों में से परिवार के अन्य सदस्यों को इंजेक्शन किसने लगाए थे। हालांकि प्रारंभिक जांच में ये अनुमान लगाया जा रहा है कि इन दोनों में से प्रिया ही प्राइवेट हॉस्पिटल में काम करते हुए इंजेक्शन लगाने का अनुभव रखती थी। 11 मृतकाें में से एकमात्र उसी के पैर में केनूला लगा था। संभव है कि ऐसा उसने खुद ही किया होगा। लेकिन मौके पर मिली नींद की गोलियों के खाली रैपर, कई इंजेक्शन, सीरिंज और कीटनाशक के डिब्बे कहां से खरीदे गए थे, इसकी पड़ताल की जा रही है।

मौत का संभावित घटनाक्रम

  • तीनाें बहनाें ने सहमति से परिवार काे खत्म करने का निर्णय ले लिया था।
  • इसके लिए सभी काे खाने में नींद की गाेलियां दी गई होंगी।
  • इंजेक्शन, सीरिंज एवं कीटनाशक का इंतजाम किया गया था।
  • सभी के गहरी नींद में जाते ही नर्स बहन प्रिया ने इंजेक्शन में कीटनाशक भरा हाेगा।
  • एक-एक कर माता-पिता, भाई-बहनों व मासूम भतीजाें-भांजाें काे जहरीले इंजेक्शन लगाए हाेंगे।
  • सबसे अंत में प्रिया ने खुद इंजेक्शन लगाया हाेगा, इसके लिए पैराें में पहले से केनुला लगाया था।

भाई की बेटी दीया, जिसे लक्ष्मी ने पाल पोस कर बड़ा किया।


सुसाइड नोट की एफएसएल जांच
पुलिस को रविवार को मौके से मिला सुसाइड नोट टूटी-फूटी हिंदी भाषा में लिखा था। ये किसने लिखा था, इसकी जांच एफएसएल से होगी। इसके लिए पुलिस ने घटनास्थल से प्रिया और लक्ष्मी के नर्सिंग के नोट्स या कुछ कॉपियां ली हैं, ताकि सुसाइड नोट की लिखावट से मिलान करवाकर पुष्टि की जा सके कि वो किसने लिखा था।

आईजी और एसपी ने किया घटना स्थल का मुआयना


जोधपुर रेंज के आईजी नवज्योति गोगाई व पुलिस अधीक्षक ग्रामीण राहुल बारहठ ने सोमवार को घटना स्थल का मौका मुआयना किया। आईजी ने पहले देचू पुलिस थाने पहुंच कर भी घटना की जानकारी ली। फिर आईजी व एसपी अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सुनिल के. पंवार, पुलिस उपअधीक्षक राजूराम चौधरी व देचू थाना प्रभारी हनुमानराम विश्नोई सहित घटना स्थल पर पहुंचे व घटना स्थल का मौका मुआयना किया। उसके बाद वहां खेत में बने घर व आसपास रहने वालों से घटना के बारे में जानकारी ली।


दस दिन से अस्पताल नहीं जा रही थी: प्रिया बालेसर के एक निजी अस्पताल में कार्यरत थी और वो अस्पताल में ही रहा करती थी। रक्षाबंधन से पांच-दिन पहले वह अपने माता-पिता से मिलने के लिए घर आई थी। तब से वह वापस अस्पताल नहीं गई थी।

फार्महाउस संचालक और पड़ोसी करते थे मदद
सूत्रों के अनुसार सुसाइड नोट में बागसिंह व बडा का जिक्र आया तो पुलिस ने इनके बारे में भी पड़ताल की। इसमें पता चला कि बडा के फार्म हाउस पर ये परिवार कृषक का काम करता था। जबकि बागसिंह का फार्महाउस भी इसके पास ही है। जब भी समय मिलता तो भील परिवार उनके यहां भी मजदूरी करने जाता था।

बताया जाता है कि भील परिवार जिस फार्महाउस पर काम करता था, उसके मालिक माणकराम विश्नोई से भीयांराम ने इजारे पर लिया था। भील परिवार उन्हीं के लिए काम करता था। इससे पहले यह परिवार दौलतसिंह के कृषिफार्म पर काम करता था।

स्पेशल टीम करेगी जांच
एसपी बारहठ के अनुसार इसमें कई पहलुओं पर जांच की जानी है। इसके लिए अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक स्तर के अफसर को जांच सौंपी है। इनके साथ दो उप अधीक्षक, 4 इंस्पेक्टर, 1 सब इंस्पेक्टर, साइबर टीम एवं स्पेशल टीम काे लगाया गया है। ये टीमें आंगणवा, मंडाेर थाना, घटनास्थल, बालेसर व अन्य स्थानाें पर जाकर जांच कर रही है।

ये अंतिम संस्कार एक परिवार का नहीं... पुलिस, समाज और सरकाराें के सिस्टम का है

  • क्याेंकि... परिवार ने जब-जब पुलिस में शिकायत की प्रताड़ित ही किया गया
  • संबंधी और समाज ने मदद के बजाए इन पर ही केस का भार थाेप दिया
  • केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकार तक शिकायत, लेकिन कहीं मदद नहीं मिली


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जोधपुर के सूथला में हुए अंतिम संस्कार में एक परिवार की इतनी अर्थियां देख उपस्थित सभी लोगों की आंखें नम हो गई।


Source From
RACHNA SAROVAR
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