आचार्य विद्यासागर महाराज का 75वां अवतरण दिवस शनिवार (शरद पूर्णिमा) को मनाया जाएगा। इस अवसर पर केसरबाग रोड स्थित नेमीनाथ जैन मंदिर में भास्कर से विशेष चर्चा में उन्होंने विभिन्न विषयों पर बात की। कोरोना को लेकर उन्होंने कहा कि कोरोना जैसी महामारी आएंगी और चली जाएंगी। स्वस्थ रहने के लिए शाकाहार और साधु-संतों की संयमित जीवन शैली अपनाना होगी।
कोरोना से कई लोगों का रोजगार गया है, सरकार को राजनीति की चिंता छोड़कर भुखमरी और पलायन रोकना चाहिए। गांवों में शहर जैसी सुविधा देंगे तो उन्हें शहर भागने की जरूरत नहीं पड़ेगी। आचार्य श्री यहां 5 जनवरी को आए थे, दीक्षा के बाद संभवत: इंदौर पहला शहर बन गया है, जिसे उनका इतना लंबा सानिध्य मिला है। उनके 75वें जन्मदिवस ने इसे और खास बना दिया है।
जैन समाज के सबसे बड़े संत आचार्य विद्यासागर की जीवन शैली ऐसी है
आहार: एक भाग भोजन, दो भाग पानी, एक भाग खाली
आचार्य को दीक्षा ग्रहण किए 50 वर्ष से अधिक समय हो गया। तब से नमक व मीठा नहीं खाते। एक शिष्य ने पूछा कि बिना नमक सब्जी कैसे खा पाते हैं तो जवाब दिया तुम भोजन में नमक, मिर्च आदि का स्वाद लेते हो, लेकिन मैं प्राकृतिक अन्न लेता हूं। वे हरी सब्जी, हरे फल, ड्राय फ्रूट्स, मावा, तले पदार्थ का उपयोग नहीं करते। एक भाग भोजन, दो भाग पानी और एक भाग खाली (उनोदर तप) का पालन करते हैं।
आचरण: ज्यादातर मौन रहते हैं, व्यवहार से ही शिक्षा का प्रयास
वे बिजली व उससे चलने वाले उपकरणों का उपयोग नहीं करते हैं। इलेक्ट्रॉनिक संसाधन से भी परहेज करते हैं। प्राकृतिक जीवन शैली का पालन करते हैं। रात विश्राम व चिंतन में व्यतीत करते हैं और दिन में ध्यान, अध्ययन, अध्यापन आदि। ज्यादातर मौन रहते हैं। प्रवचन भी सीमित ही देते हैं। इसके बजाय आचरण से ही शिक्षा देने का प्रयास करते हैं। कभी दीवार पर टिकते नहीं, दिगंबर वृत्ति के कारण कभी दरवाजा भी नहीं लगाते हैं।
आत्मोन्नति: साईबान के लिए करते हैं प्रेरित
आचार्य कहते हैं कि पैरों का मर्दन, आंखों का बंधन, मन-मस्तिष्क को चिंतन ये आत्मा के विकास के मार्ग हैं। आसन और अशन (आहार) की शुद्धि ध्यान की ओर प्रवृत्त करती है। वे लोगों की तरफ बहुत कम दृष्टि करते हैं। गांधारी का उदाहरण देते हैं। शिष्यों को साईबान के लिए प्रेरित करते हैं। साईबान घोड़ों की आंख पर बांधी जाने वाली पट्टी को कहते हैं, जिससे वह एक ही दिशा में देखता है।
बातचीत के प्रमुख अंश
ऑनलाइन शिक्षा : यह भारतीय परंपरा नहीं है। जब तक विद्यार्थी शिक्षक के सामने नहीं होगा, उसके भाव पढ़ने के नहीं बनेंगे। ये व्यवस्था अल्प समय की है।
रोजगार का संकट : व्यावसायिक लोगों को मशीनरी का उपयोग न कर गरीब जनता को काम देना चाहिए। कोरोना के कारण जो क्षति हुई उसकी पूर्ति हो जाएगी।
राजनीति : राजनीति और धर्म नीति अलग-अलग है। धर्मनीति में इंसान और इमान बराबर होते हैं। राजनीति में अलग-अलग।
पड़ोसी देशों का बढ़ता दबाव : भारत में शाकाहार का प्रचलन ज्यादा है इसलिए हर मसले पर सोच-समझकर, शांतिपूर्वक निर्णय करते हैं। कोई भी देश भारत का कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। हमारे पास अहिंसा की शक्ति है।
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Source From
RACHNA SAROVAR
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