(दीपक आनंद) नई शिक्षा नीति में प्रावधान किया गया है कि विदेशी विश्वविद्यालय भी भारत में आकर अपना कैंपस संचालित कर सकते हैं। इससे न सिर्फ छात्रों बल्कि देश के शिक्षकों को भी बड़ा फायदा होगा। उनके पास बेहतर संस्थानों में पढ़ाने का विकल्प होगा। मिनिस्ट्री ऑफ एक्सटर्नल अफेयर्स की साल 2019 की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत से प्रतिवर्ष साढ़े सात लाख छात्र विदेश में पढ़ने जाते हैं। करीब 40 हजार करोड़ रुपए सालाना विदेशी शिक्षा, वहां पर रहने आदि पर खर्च करते हैं।
भारत में विदेशी क्वालिटी एजुकेशन संस्थानों के आने से इस राशि का आउटफ्लो कम होगा। देश में रहने से छात्रों का खर्चा भी बचेगा। विदेशी संस्थानों के भारत में आने से यहां के संस्थानों को भी अपनी क्वालिटी को और बेहतर करना होगा। इसके साथ ही विदेशी संस्थानों में एडमिशन के लिए प्रतिस्पर्धा अधिक व बेहतर होने से छात्र पढ़ाई के प्रति और भी अधिक गंभीर होंगे। विदेशी संस्थानों के पास भारतीय संस्थानों के साथ टाईअप करने का अच्छा अवसर होगा।
शिक्षकों के पास भी होगा बेहतर विकल्प
फैकल्टी की जरूरत को देखते हुए फॉरेन यूनिवर्सिटीज देश की फैकल्टी को प्राथमिकता देंगी। यहां के एकेडमिशियन और रिसर्चर्स के पास भी मौका होगा कि वे विदेशी विवि के साथ जुड़ सकें।
वर्ल्ड रैंकिंग में पिछड़ना बाहर जाने का कारण
अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में हमारे संस्थान पीछे हैं। यूएसए व यूरोप के संस्थान आगे हैं। वर्ल्ड रैंकिंग में सिर्फ आईआईटीज का ही जिक्र ही होता है।
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Source From
RACHNA SAROVAR
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