लॉकडाउन और कोरोना के खतरे की वजह से सूरत में 1000 से अधिक छोटे और मझोले ट्यूशन क्लासेज संकट में आ गए हैं। पिछले 4-5 महीने से छात्रों की फीस नहीं आ रही है। किराए के मकान में ट्यूशन क्लासेज चलाने वाले संचालकों को सबसे ज्यादा परेशानी हो रही है। इस वजह से कुर्सी, बेंच, बोर्ड बेचने को मजबूर हैं। चूंकि अभी भी यह तय नहीं है कि स्कूल कब से खुलेंगे। जब स्कूल ही नहीं खुलेंगे तो ट्यूशन क्लासेज में बच्चे कहां से पढ़ने आएंगे। पांडेसरा, लिंबायत, डिंडोली, गोडादरा, उधना, वराछा, कतारगाम, रांदेर में चलने वाले छोटे-मझोलेे ट्यूशन क्लासेज के संचालक ज्यादा परेशान हैं।
ट्यूशन क्लासेज में पढ़ाने वाले कुछ लोगों ने परिवार चलाने के लिए दूसरे काम-धंधे शुरू कर लिए हैं। भास्कर संवाददाता ने पिछले 4-5 माह से बंद पड़े छोटे-मझोले ट्यूशन क्लासेज संचालक और शिक्षकों आदि से बात करके पूरे मामले की पड़ताल की। वास्तविक स्थिति को समझने का प्रयास किया। इस दौरान पता चला कि ट्यूशन संचालक जो कई लोगों को रोजगार दे रहा था, वह खुद ही परेशान है। वहीं, पढ़ाने वाले शिक्षक भी अब दूसरा काम-धंधा कर रहे हैं। गर्मी की छुटि्टयों में क्लासेज में ज्यादा भीड़ होती है। लॉकडाउन की वजह से संचालकों को पुरानी फीस भी नहीं मिली है।
संकट: घर चलाना ही मुश्किल है तो पैरेंट्स बच्चों की फीस कहां से भरेंगे
पांडेसरा, लिंबायत, डिंडोली और उधना जैसे इलाकों में चलने वाले छोटे-छोटे ट्यूशन क्लासेज स्कूल संचालकों को काफी नुकसान उठाना पड़ा है। ट्यूशन क्लासेस के संचालकों के मुताबिक जितने बच्चे उनके यहां पढ़ते थे उन सभी के घर पर फोन कर बकाया फीस मांगी गई तो कई ने कहा अभी नहीं दे सकते हैं। उनसे पूछा गया कि कब तक फीस दे पाएंगे तो उन्होंने कहा कि नहीं दे पाएंगे। लगभग 90% बच्चों के अभिभावकों ने फीस देने से इनकार कर दिया है। सभी का यही कहना है कि अभी तो घर चलाना ही मुश्किल हो रहा है तो फिर फीस कहां से भरें। हर जगह से उम्मीद खत्म होने के बाद ही ट्यूशन क्लासेज को बंद करने का निर्णय लिया गया।
आठ साल से ट्यूशन क्लासेज में पढ़ा रहे थे, अब मिल में नौकरी कर रहे
डिंडोली में रहने वाले नरेंद्र माली 8 साल ने निजी स्कूल में पढ़ा रहे थे। लॉकडाउन में नौकरी छूट गई तो पांडेसरा की एक डाइंग मिल में हेल्फर का काम करने लगे। वहीं, डिंडोली के गोवर्धन नगर में रहने वाले जितेंद्र झा पिछले 17 साल से ट्यूशन क्लासेज में बच्चों को पढ़ा रहे थे। कोरोनाकाल में ट्यूशन क्लासेज बंद होने की वजह से घर का खर्च चलाना भी मुश्किल हाे गया। अब एक कुरियर कंपनी में पार्सल पहुंचाने का काम कर रहे हैंं। लोगों के घर-घर जाकर उनका सामान पहुंचा रहे हैं। जितेंद्र झा ने बताया कि कोरोना में जिंदगी बोझ बन गई है। मैं इस मुसीबत को झेलने के तैयार हूं, क्योंकि शिक्षक हमेशा संकट से जूझना सिखाता है। आज एक-एक शिक्षक इस मुसीबत से लड़ने के लिए तैयार है।
निजी स्कूल में पढ़ा रहे थे, नौकरी छूट गई तो अब फूड डिलीवरी करने लगे
डिंडोली में रहने वाले सूरज तिवारी 20 साल से निजी स्कूल में बच्चों को पढ़ा रहे थे। पहले गांव में पढ़ाते थे, बाद में सूरत आ गए और यहां एक स्कूल में पढ़ाने लगे। कोरोना में स्कूल बंद होने की वजह से उनकी नौकरी छूट गई। सूरत तिवारी ने बताया कि संकटकाल में कोई भी मदद करने को तैयार नहीं था तो जोमैटो में फूड डिलीवरी करने लगा। अब घर-घर खाना पहुंचा रहा हूं। दो-तीन घंटे समय निकालकर कुरियर कंपनी में भी डिलीवरी करता हूं। स्कूल में पढ़ाते थे तो टाइम पर तनख्वाह मिल जाती थी, अब एक पार्सल पहुंचाने पर 13 रुपए मिलते हैं। दिनभर में केवल 7-8 पार्सल ही पहुंचा पाता है। बड़ी मुश्किल से 100 रुपए मिलते हैं। सूरत तिवारी ने बताया कि रोटी और प्याज खाकर मुश्किल से दिन गुजार रहा हूं।
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Source From
RACHNA SAROVAR
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